Original writings
सुनसान चौक,
तन्हा मेले,
और भीत के आले
भी भरने लगते हैं दिन के उजाले में।
लेकिन कुछ दरख़ते तरसते रह जाते है...
एक दस्तक की बाट में।।
--- नारायणी