किन्हीं फुरसत के लम्हों की जो सालो से इच्छा थी
लो अब जा के मिल ही गए।
बीमारी के बहाने ही सही
कुछ उनकी सुन और दो मन की कह तो ली
लो एक चुस्की फुसरत की
बैठ बालकनी में नसीब हो ही गई
हाथो में ताज़ा अखबार नहीं तो क्या...
पुरानी गृहशोभा और संगिनी तो मिली।
अपनों से अपने कुछ शिक्वे तो मिटे
और अब जाकर घर की चारों दीवारें
..... एक साथ एक छत के नीचे बैठी तो सही।
बीमारी के सहारे ही सही
दो बातें अपनों से हस बैठ के हुई तो सही।
--- नारायणी