पहचान

दरिया हु,
पर फिर भी प्यासी मैं।

रोशनी की किरण हु,
पर अन्धेरो मे कहीं गुमनाम मैं।

हर मन्जिल की राह हु,
पर खुद के रास्तों मे भटकी मै।

हर रिश्ते की नींव हु,
पर हर गलती का कारण मैं।

एक औरत हु,
अब मानुष बनना चाहु मैं।।

---नारायणी

6 comments: