Family time in covid-19 lockdown


किन्हीं फुरसत के लम्हों की जो सालो से इच्छा थी
लो अब जा के मिल ही गए।

बीमारी के बहाने ही सही
कुछ उनकी सुन और दो मन की कह तो ली

लो एक चुस्की फुसरत की
बैठ बालकनी में नसीब हो ही गई

हाथो में ताज़ा अखबार नहीं तो क्या...
पुरानी गृहशोभा और संगिनी तो मिली।

अपनों से अपने कुछ शिक्वे तो मिटे
और अब जाकर घर की चारों दीवारें
..... एक साथ एक छत के नीचे बैठी तो सही।

बीमारी के सहारे ही सही
 दो बातें अपनों से हस बैठ के हुई तो सही।

--- नारायणी

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