Original writings
कुछ गुफ्तगू जो उस रोज़ रह गई थी,
वो अभी बाकी है...
सांसे जो धड़कनों से रुसवा हुई थी,
सुलह बाकी है...
महफ़िल की रौनक भी जिसके नाम की थी,
जाम का प्याला हाथ में लिए वो प्यासा...
.....शायद एक साकी है।।
--- नारायणी
दिन तो जैसे तैसे बीत जाता हैं,
शोर गुल की भीड़ में...
पर सनम, राते है,
जो बड़ी वीरानी लगती है।
तुम्हे याद करते करते, होंठो पर मुस्कान तो आ जाती है...
पर आंखे तुम्हारे बिना,
बस खारे में डूबी रहती है।
कोई शिकवा नहीं, तुम्हारी बेवफाई से मुझे...
ना नाराजगी प्यार भरे अल्फजो से,
पर हां... वफाओं की बाते अब कुछ आसमानी सी लगती है ।।