लम्हे जो याद बन कर
चिलम को सुलगाते हैं,
वक्त के साथ धुआं हो कर,
नम आंखों की वजह भी बन जाते हैं।
--- नारायणी
लम्हे जो याद बन कर
चिलम को सुलगाते हैं,
वक्त के साथ धुआं हो कर,
नम आंखों की वजह भी बन जाते हैं।
--- नारायणी
गहरी तो वो आंखे हैं,
जिनमें एक जहां दिखता हैं।
प्यास की तड़प
तो सिर्फ पानी चाहें...
वर्ना एक दरिया हैं,
जो सिर के ऊपर भी तो बहता है।
--- नारायणी
कुछ गुफ्तगू जो उस रोज़ रह गई थी,
वो अभी बाकी है...
सांसे जो धड़कनों से रुसवा हुई थी,
सुलह बाकी है...
महफ़िल की रौनक भी जिसके नाम की थी,
जाम का प्याला हाथ में लिए वो प्यासा...
.....शायद एक साकी है।।
--- नारायणी
दिन तो जैसे तैसे बीत जाता हैं,
शोर गुल की भीड़ में...
पर सनम, राते है,
जो बड़ी वीरानी लगती है।
तुम्हे याद करते करते,
होंठो पर मुस्कान तो आ जाती है...
पर आंखे तुम्हारे बिना,
बस खारे में डूबी रहती है।
कोई शिकवा नहीं,
तुम्हारी बेवफाई से मुझे...
ना नाराजगी प्यार भरे अल्फजो से,
पर हां... वफाओं की बाते अब कुछ आसमानी सी लगती है ।।
--- नारायणी
Sitting on the couch in the bay window, she gazes the stars in the dark empyrean; the misty clouds playing with the moon and the balmy moon...